धर्म और समाज

वह जो अनंत है वह या तो आसमान है या बस एक मेरी मां है: क्षेत्र प्रचार प्रमुख कैलाशचंद्र

इतिहास की छुपी वीरांगनाएं रहीं चर्चा का केंद्र

इन्दौर, 13/ 07/ 2025। भारतीय नारी विमर्श अध्येता समूह, मालवा प्रांत द्वारा रविवार को श्री देवी अहिल्या शिशु विहार में एक विचार मंथन सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत सपथ ग्रहण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई, जिसके बाद मां सरस्वती की पूजा-अर्चना कर सभी वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए। भारतीय नारी विमर्श अध्ययन समूह को क्षेत्र प्रचार प्रमुख कैलाश चन्द्र जी ने संबोधित किया। उन्होंने कहा वह जो अनंत है वह या तो आसमान है या बस एक मेरी मां है। भारतीय नारी विमर्श विषय जब हमारे देश के संदर्भ में सामने आता है तो उसकी प्रासंगिकता और आयाम बदल जाते हैं। नारी विमर्श सिर्फ किसी ताजी खबर या घटना पर नारी के बारे में होने वाली घटना पर नहीं होना चाहिए। नदी अपने प्रवाह में रहती है इस विमर्श का उद्देश्य नारी की वर्तमान स्थिति। वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक की स्थिति पर चिंतन करना है। उन्होंने नारी विमर्श के आदिकाल से वर्तमान तक के प्रवाह को स्पष्ट किया।इस व्याख्यानमाला में महिलाओं की ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्रों में भूमिका पर वक्ताओं ने गहन प्रकाश डाला। महिलाओं की स्थिति और वैदिक चेतना पर चर्चा मे वर्तमान में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है, जबकि भारत का मूल दर्शन “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते” रहा है। उन्होंने पितृसत्ता की आलोचना के साथ पूर्वोत्तर भारत की मातृसत्तात्मक व्यवस्था को रेखांकित किया। प्रांत संयोजिका देवयानी ने शोधपत्रों की उपयोगिता पर बल दिया। उन्होंने भारतीय नारी विमर्श के उद्देश्यों को प्रस्तुत किया। वैदिक काल में महिलाएं बौद्धिक, धार्मिक चर्चाओं में भाग लेती थीं। उन्होंने गुरुकुलों में शिक्षा प्राप्त की और शास्त्रार्थ किया। उन्होंने कहा कि भारतीय पाठ्यक्रम में गार्गी, मैत्रेयी, घोषा जैसी ऋषिकाओं की बजाय रजिया सुल्तान जैसी आक्रांताओं की महिलाओं को स्थान दिया गया। ऋग्वेद में 27 ऋषिकाओं का उल्लेख इसका प्रमाण है।

धर्म और इतिहास में महिला नेतृत्व : प्रेरणा मनाना ने गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी से लेकर मौर्य वंश तक महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म में महाप्रजापति गौतमी, सुमेधा, सूमां जैसी भिक्षुणियां प्रसिद्ध थीं। जैन धर्म में राजकुमारी जयंती और याकिनी महतारा उल्लेखनीय हैं। मौर्य काल में दुर्धरा और प्रभावती गुप्त का योगदान रहा। रानी अब्बक्का ने पुर्तगालियों से युद्ध कर देश की रक्षा की। उनके नाम पर ‘अभय पुरस्कार’ भी दिया जाता है। स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधारों में योगदान 1857 से 1947 के दौरान महिलाओं के योगदान पर प्रकाश डाला गया  । रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, अवंतीबाई जैसी वीरांगनाओं का संघर्ष सती, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष और नारी चेतना का जागरण  मध्यकालीन और औपनिवेशिक काल में महिला नेतृत्व पर प्रकाश डाला गया । रानी दुर्गावती, जीजामाता, सावित्रीबाई फुले, मीरा बाई, पंडिता रमाबाई, आनंदीबाई जोशी आदि का उल्लेख किया। स्वतंत्रता संग्राम में सरोजिनी नायडू, दुर्गाबाई देशमुख और कस्तूरबा गांधी के योगदान को रेखांकित किया। स्वतंत्रता के बाद महिला वैज्ञानिकों का योगदान सावित्री महंत ने बताया कि स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय महिलाओं ने विज्ञान और अनुसंधान में बड़ी भूमिका निभाई। असीमा चटर्जी, कमला सोहनी, ऋतु करिधाल, अनुराधा टीके, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स जैसी वैज्ञानिकों का नाम प्रमुख रहा। चंद्रयान-2 में 30% महिलाओं की भागीदारी और ‘मिशन मंगल’ में 27% योगदान उल्लेखनीय रहा। समाज में अनुशासन और आधुनिक चुनौतियां मे Live-in Relationship और जिहादी मानसिकता पर चिंता जताई गई। उन्होंने कहा कि आज की लड़कियों को मानसिक रूप से भ्रमित कर अपराधों की और उकसाया जा रहा है। साथ ही उन्होंने आधुनिक युग में अनुशासन की कमी पर चिंता व्यक्त की।कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं की भारी उपस्थिति रही और व्याख्यानमाला ने भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका पर नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

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