धर्म और समाज

श्री महाकालेश्वर भगवान की चतुर्थ सवारी में 4 जनजातीय, लोक नृत्य कलाकारों के दल सहभागिता करेंगे

 उज्जैन | मध्यप्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की मंशानुरूप बाबा श्री महाकालेश्वर की सवारी को भव्य स्वरुप देने के लिए 4 जनजातीय कलाकारों के दल श्री महाकालेश्वर भगवान की चतुर्थ सवारी में सहभागिता करेगा | जिसमे श्री मनीष सिसोदिया के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में धार से भगोरिया नृत्य , श्री मोजीलाल ड़ाडोलिया छिंदवाड़ा का भारिया जनजातीय भडम नृत्य , उज्जैन के सुश्री कृष्णा वर्मा के नेतृत्व में मटकी लोक नृत्य, श्री राहुल धुर्वे सिविनी के नेतृत्व में गोंन्ड जनजातीय सैला नृत्य सम्मिलित है | यह सभी दल श्री महाकालेश्वर भगवान की सवारी के साथ अपनी प्रस्तुति देते हुए चलेगे | सभी जनजातीय दल संस्कृति विभाग भोपाल, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद व ‍त्रिवेणी कला एवं पुरातत्वव संग्रहालय के माध्यम से भगवान श्री महाकालेश्वर जी की चतुर्थ सवारी सहभागिता करेगे |
दलों का परिचय 1. भील जनजातीय भगोरिया नृत्य, धार: भगोरिया मुख्य रूप से भील जनजाति का त्योहार है | लेकिन इसमें भिलाला और पटेलिया जैसी अन्य जनजातीया भी भाग लेती है | भगोरिया मध्य प्रदेश की भील जनजाति का एक प्रसिद्ध त्यौहार और मेला है, जो झाबुआ, अलीराजपुर और धार जिलों में मनाया जाता है | यह होली से पहले सात दिनों तक चलता है और इसे “भगोरिया हाट” भी कहा जाता है | भगोरिया, भील समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव है, जिसमें युवक-युवती अपने जीवनसाथी का चुनाव करते हैं, और इस दौरान मेले, नृत्य और पारंपरिक संगीत का आयोजन होता है | यह नृत्य होली से 7 दिन पहले भगोरिया उत्सव के दौरान किया जाता है. यह झाबुआ, अलीराजपुर और धार जिलों में प्रसिद्ध है. भगोरिया नृत्य में पुरुष और महिलाएँ दोनों भाग लेते हैं, और इसे “गैर” कहा जाता है |
 2. भारिया जनजातीय भडम नृत्य, छिंदवाड़ा:  भड़म नृत्य भारिया जनजाति का एक लोकप्रिय लोक नृत्य है, जो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में होता है । इस समाज के हर उम्र के लोगों को नृत्य कला का पूरा ज्ञान होता है। इनके वाद्य यन्त्र भी विशेष आकर्षण लायक होते हैं, ये आकार में बड़े और गोल होते हैं। ये अपने सभी वाद्य यंत्रों का निर्माण स्वयं करते हैं। यह नृत्य समूहों में किया जाता है, जिसमें ढोल और टिमकी जैसे वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है । भारिया जनजाति के लोग भड़म नृत्य अपने हर्ष एवं उल्लास व्यक्त करते हुए करते हैं। विशेषकर भारिया आदिवासी विवाह के अवसर या अन्य किसी खुशी के अवसर इस नृत्य को कर आनन्दित होते हैं। नर्तक एक घेरा बनाते हैं और ढोलक और टिमकी बजाने वाले सदस्य भी घेरे में घूमते हुए वादन करते हैं.
3. मटकी लोक नृत्य, उज्जैन: ‘मटकी’ नृत्य शैली मध्य प्रदेश की खानाबदोश जनजातियों द्वारा विकसित की गई है। एक “छोटे घड़े” का उपयोग करके किया जाने वाला यह लोक नृत्य मध्य भारत से उत्पन्न हुआ है और इसे “मटकी नृत्य” के रूप में जाना जाता है। मटकी लोकनृत्य मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो महिलाओं द्वारा विवाह, जन्मदिन या अन्य उत्सवों में किया जाता है। इसे “घट-नृत्य” के रूप में भी जाना जाता है। यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है, जो अपने सिर पर मटकी (एक छोटा घड़ा) रखकर करती हैं। ढोल (ड्रम) जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग नृत्य के साथ संगत के लिए किया जाता है। मटकी नृत्य मध्य प्रदेश की संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
4. गोंन्ड जनजातीय सैला नृत्य, सिवनी:  सैला छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति का आदिवासी नृत्य है, जो फसल की कटाई के बाद किया जाता है। जब अनाज घर में आ जाता है और मेहनत के रंग खेतों से होकर घर के आंगनों में बिखरने लगता है तो चारों ओर हर्ष उल्लास का माहौल होता है। कलाकारों के लाल-पीले कुर्ते – साडि़यां, काली जैकेट और धोती से एक खुशनुमा तस्वीर नज़र आती है। ढ़ोल, टिमकी और गुदुंब वाद्य यंत्रों से निकलती ध्वनियों पर उल्लास में थिरकते पैरों को मानो सारे जहां की खुशियां मिल गई हों। नृत्य में औरतें भी हिस्सा लेती हैं। नर्तकों के हाथ में स्टिक्स होती हैं, जिसे वे साथी कलाकार के साथ बजाकर नृत्य करते हैं। नृत्य के समापन पर अनाज दिया जाता है और उसी से सभी मिलजुल कर खाना खाते हैं और अगली फसल के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।

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