राजस्थान

भारतीय ज्ञान परम्परा एवं भारतीय भाषाएं विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का समापन

जयपुर। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली एवं राजस्थान शिक्षक प्रशिक्षण विद्यापीठ, जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “भारतीय ज्ञान परम्परा एवं भारतीय भाषाएं” विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का समापन 30 जनवरी 2026 को राजस्थान शिक्षक प्रशिक्षण विद्यापीठ, शाहपुरा बाग, आमेर रोड, में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में पावन सानिध्य एवं आशीर्वाद महंत हरिशंकर दास वेदांती, सियाराम दास जी की बगीची, ढेहर का बालाजी द्वारा प्रदान किया गया। समापन सत्र के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात के पूर्व कुलपति प्रो.अर्कनाथ चौधरी ने की।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर की निदेशक डॉ. लता श्रीमाली, एनसीटीई, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. एस. के. सोहान, संस्कृत शिक्षा के सेवानिवृत्त निदेशक प्रो. सुरेन्द्र कुमार शर्मा तथा केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के सह निदेशक (प्रशासन) प्रो. शीशराम उपस्थित रहे। अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। राजस्थान संस्कृत साहित्य सम्मेलन के महामंत्री डॉ. राजकुमार जोशी एवं संस्थान निदेशक आशीष जोशी ने सभी आगन्तुक अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. सुभाष मीना ने द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विषय-वस्तु, प्रस्तुत शोध-पत्रों एवं विमर्श की समग्र रूपरेखा पर प्रकाश डाला। द्वि दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान देश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से पधारे विद्वानों एवं शोधार्थियों ने भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय भाषाओं की भूमिका तथा शास्त्रीय ज्ञान और आधुनिक दृष्टिकोण के समन्वय से सम्बन्धित अनेक शोध-पत्रों का वाचन किया। समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व को संतुलित एवं समग्र जीवन-दृष्टि प्रदान करती है तथा भारतीय भाषाएं इस परम्परा की सशक्त संवाहक हैं। उन्होंने शोध एवं शिक्षा के माध्यम से भारतीय भाषाओं को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का आह्वान किया।उन्होंने भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर बल देते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व है कि वे भारतीय ज्ञान परम्परा को जनमानस से जोड़ने की बात कही। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. अर्कनाथ चौधरी ने कहा कि भारतीय भाषाओं में निहित ज्ञान आज भी आधुनिक विज्ञान एवं समाज के लिए अत्यंत उपयोगी है, आवश्यकता है उसे समकालीन संदर्भों से जोड़ने की। इस अवसर प्रो. आनन्द पुरोहित, प्रो. सत्यनारायण शर्मा, डॉ. दिवाकर मिश्र, डॉ. सीताराम दोतोलिया, डॉ शालिनी सक्सेना डॉ. कैलाश चन्द्र बुनकर, डॉ. सुभद्रा जोशी, डॉ.मीनाक्षी जोशी, जितेन्द्र कुमार सहित बड़ी संख्या में संस्कृत अनुरागी, विद्वान एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन डाॅ.कविता भारद्वाज एवं डाॅ.दिलीप कुमार पारीक ने किया।

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